Maharishi Valmiki Jayanti in India - Holidays - Time and Date | महर्षि वाल्मीकि जयंती

Maharishi Valmiki Jayanti in India - Holidays - Time and Date 


 प्राचीन काल से भारत की धरती में एक से बढ़कर एक महा ऋषि मुनियों ने जन्म लिया विज्ञान आज जिस भी चीज की खोज कर आता है उसका ज्ञान हमारे ऋषि-मुनियों ने आज से हजारों साल पहले ही हमें दे दिया था महान ऋषि मुनियों की धरती भारत भूमि में एक ऐसे ही ऋषि भगवान वाल्मीकि का जन्म भी हुआ था जिन्होंने रामायण जैसे अद्भुत महाकाव्य की रचना की जिसने दुनिया को विश्व बंधुत्व तथा भाईचारे का संदेश दिया इस पौराणिक ग्रंथ द्वारा दी गई वाल्मीकि जी की शिक्षा आज भी लोगों के लिए अमूल्य है पूरे भारतवर्ष में प्रतिवर्ष वाल्मीकि जयंती बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है !

 दोस्तों ! इस असाधारण महा ऋषि वाल्मीकि जी का जीवन हमें सही राह पर चलने को प्रेरित करता है और यह भी समझ आता है कि जीवन में घटने वाली प्रत्येक घटनाएं चाहे वह कितनी भी छोटी क्यों ना हो उससे इंसान को हमेशा प्रेरणा लेकर अपने जीवन में परिवर्तन ला सकता है वाल्मीकि जी के जीवन में घटी हुई एक घटना ने उनके जीवन को जीने का नजरिया ही बदल दिया था उनको और उनको एक डाकू रत्नाकर से वाल्मीकि जैसे ज महान पूज्यनीय ऋषि के श्रेणी में खड़ा कर दिया !

महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत भाषा में रामायण की रचना की थी। उनके द्वारा रची गई रामायण को आज लोग वाल्मीकि रामायण के नाम से जानते हैं यह रामायण पूरी तरह से संस्कृत भाषा में लिखी गई है क्योंकि महर्षि वाल्मीकि संस्कृत के प्रथम महाकाव्य की रचना की थी इसीलिए उनको आदि कवि भी कहा जाता है।

महा ऋषि वाल्मीकि प्रथम श्लोक के रचनाकार भी थे दोस्तों हिंदू धर्म की पौराणिक महाकाव्य रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का जन्म उत्सव या वाल्मीकि जयंती अश्विनी मास की शरद पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है वाल्मीकि जयंती को प्रकट दिवस के रूप में भी मनाया जाता है महर्षि वाल्मीकि का वास्तविक नाम रत्नाकर था रत्नाकर परिणीता के पुत्र थे पर चाहिता ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे बालक रत्नाकर को बचपन में एक भील परिवार ने चुरा लिया था जिस कारण उनका पालन पोषण एक भील परिवार में होने लगा, भील परिवार में पालन पोषण होने के कारण रत्नाकर ने भील परंपराओं को सीखना एवं अपनाना शुरू किया बालक रत्नाकर जब बड़े हो गए तब अपने परिवार के पालन पोषण के लिए एक डाकू बन गए अब उनकी आजीविका लूटपाट पर निर्भर रहती थी वह प्रतिदिन जंगल से गुजरने वाले किसी न किसी राहगीर को लूट लेते थे और इस तरह से अनजाने में ही अनेक पापों को अपने सिर पर लेते जा रहे थे एक दिन जब वह जंगल में छुपकर लूटने के लिए किसी राहगीर का इंतजार कर रहे थे तभी वहां नारद मुनि प्रकट हुए नारद मुनि उस समय पृथ्वी लोक के भ्रमण पर थे रत्नाकर ने उन्हें भी लूटने के उद्देश्य पकड़ लिया मुनि ने रत्नाकर से पूछा , तुम यह सब काम क्यों कर रहे हो रत्नाकर ने जवाब दिया यही तो मेरी आय का स्रोत है !

 जिससे मैं अपने परिवार का भरण पोषण करता हूं तब नारद मुनि ने उनसे पूछा कि जिस परिवार के लिए तुम यह सब पाप हर रोज करते हो क्या परिवार तुम्हारे पापों का फल भोगने के वक्त भी तुम्हारे साथ रहेगा रचनाकार ने बड़ी विश्वास के साथ कहा हां क्यों नहीं मेरा परिवार हमेशा मेरे साथ देगा तो मेरे पापों को अपने सिर लेने के लिए क्यों नहीं तैयार होगा नारद जी ने यह सुनकर मुस्कुराए एक बार घर जाकर अपने परिजनों से पूछ लो अगर उन्होंने आपकी बात मान ली और उन्होंने इस प्रश्न के जवाब में हां कहा तो मैं तुम्हें बहुत सारा धन दूंगा दोस्तों रत्नाकर बड़े ही आत्मविश्वास के साथ घर गया और उसने अपने परिजनों से एक-एक करके यही प्रश्न दोहराया लेकिन किसी ने भी इस सवाल का जवाब हां मैं नहीं दिया और उन्हें पहली बार अपनी गलतियों का एहसास नहीं दिया रत्नाकर को इस घटना से भारी दुख पहुंचा रत्नाकर ने इस मार्ग को तुरंत छोड़ कर सत्य मार्ग पर चलने का दृढ़ निश्चय किया, नारद ने रचनाकार को सत्य मार्ग पर चलने का राह दिखाएं और उन्हें राम नाम का महामंत्र जब अपने की सलाह दी जिसके फलस्वरूप वाल्मीकि परिवार को छोड़कर वन में तपस्या करने चले गए जहां वह कई सालों तक तपस्या करते रहे। और राम नाम का जप करते रहे महर्षि वाल्मीकि को तपस्या करते वक्त देश दुनिया का कोई भी एहसास नहीं रहता था यहां तक कि महर्षि वाल्मीकि के शरीर में दीमक ने अपना घर बना लिया था जिसे सामान्य भाषा में बाल्मीकि कहा जाता है कई वर्षों की कठिन तपस्या करने के बाद ब्रह्मा जी उनसे प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन दिए उनके शरीर में दीमक का घर देखकर ब्रह्मा जी ने रत्नाकर को वाल्मीकि नाम से संबोधित किया बस यही से डाकू रत्नाकर का महर्षि वाल्मीकि बनने का सफर शुरू हुआ।

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