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नवरात्रि पुजा ,Navratri Puja

 नवरात्रि पुजा

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 हमारे भारत  बहुत सारे तयोहार मनाये की परम्परा है। जिन में से नवरात्रि की पुजा भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह नवरात्रि साल में दो बार आते हैं। पहले मार्च के महीने में, दुसरा अकतूबर के महीने में। माता के इन नवरात्रि का बहुत महत्व होता है। नवरात्रि में आदि शक्ति माता के नौं रुपों की पुजा की जाती है। माता के इन नौं रूपों को नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है।

माता के नौं रूपों के नाम पहला= शैलपुत्री (पीला) 
दुसरा= ब्रहमचारिणी(हरा) तीसरा=चंद्रघंटा ( घुसर) चौथा=कुषमडां (नारंगी) पाचवा=सकंदमाता ( सफेद) छटा= कातयायनी ( लाल) सातवां= कालरात्रि ( नीला) आठवाँ=महागौरी ( गुलाबी) नौंवी=सिदिदात्री( बैंगनी)
नवरात्रि के नौं दिन में माता के नौं रूपों का अलग अलग महत्व है। नवरात्रि के पहले दिन शैलपुत्री की पुजा होती है। यह पर्वत राज्य की पुत्री हैं। इनकी पुजा से प्राणी मनवांछित फल प्राप्त करता है। दुसरा दिन माता ब्राह्ममचारिणी का है। इनकी पुजा से मनुष्य के कष्टों का निवारण होता है। तिसरा दिन माता चंद्रघंटा का है इनके माथे पर चंद के आकार का अधचर्क है इनकी पुजा से अहंकार का नाश होता है। इनके घंटे में शिमला होती है।


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 चोथा दिन माता कुषमडां की पुजा का होता है। इनकी पुजा से रोग दुर होते हैं। पाचवा दिन माता सकंदमाता का होता है। यह र्कातिक की माता है। इनकी पुजा से सुख शांति की प्राप्ति होती है। छटा दिन माता कातयायनी माता का होता है। इनकी पुजा से भगत का काम सरल होता है। सातवां दिन माता कालरात्रि का होता है। यह काल का नाश करती है। आठवाँ रूप महागौरी का होता है। इनकी पुजा से असमर्थ काम सरल होता है। नौवें दिन माता सिद्भीदात्री माता का होता है इनकी पुजा से मनुष्य सिद्भी प्राप्त करता है।

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पुजा विधी : 

 पुजा के सथान पर एक चौकी रखो। उसके ऊपर एक लाल रंग का कपड़ा बिछा दो। फिर उन पर चावल रखो। चावल के ऊपर पानी का कलश रखो। र्दुगा माता की तस्वीर रखो। पानी के कलश में गंगा जल, चावल आम के पते रखो, कलश पर मोलवी बांध दो। कलश और माता की तस्वीर मर तिलक लगाकर धूप और जोत जला दो। एक नारियल भी रखो।एक कलश में जौं भी उगाया जाते हैं। 


फिर हाथ में थोड़ी से चावल लेकर माता से अपने मन की मनोकामना मांग लो नौं दिन तक अखंड ज्योति जलाकर अपने व्रत को पुरा करो। नौवें दिन माता की पुजा करने के बाद अपने घर में माता के नौं रूपों को अथात नौं कंजगों को खाना खिला कर अपने व्रत को समपूरण करो कंजगों के खाने में हलवा, पुरी, बना कर खिलाना होता है। और खुद भी वही भोजन खा कर अपने व्रत को खोलना होता है।

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